कुलपति का व्यक्ति-परिचय

प्रो. गेशे ङवङ् समतेन 
कुलपति,
कें. उ. ति. शि. सं.

सारनाथ, वाराणसी

7 जुलाई, 1956 को मध्य तिब्बत के दोखर में जन्मे प्रो. समतेन अपने माता-पिता के साथ 1959 में चीन द्वारा तिब्बत पर क़ब्जा करने के बाद भारत में आये । उन्होंने उड़ीसा के चंद्रगिरि में स्थित तिब्बतियों की केंद्रीय शाला में अध्ययन किया, तथा उसके बाद कें. उ. ति. शि. सं. में अध्ययन किया । यहाँ पर उन्होंने शास्त्री तथा आचार्य की उपाधियाँ प्राप्त कीं । पारम्परिक तिब्बती  शिक्षण प्रशिक्षण के साथ-साथ आपने आधुनिक शिक्षा पद्धति के माध्यम से अपनी शिक्षा पूर्ण की यह एक विरल संयोग है । एक भिक्षु के रूप में आपका शिक्षण व प्रशिक्षण कर्नाटक के मुंडगोड में स्थित गादेन शार्त्से मठ में हुआ यहाँ से आपने गेशे रम्पा और फिर गेशे ल्हारम्पा (पीएच्. डी. के समकक्ष) उपाधियाँ प्राप्त कीं । अध्ययन के उपरान्त आपने अपनी शैक्षणिक जीवन-यात्रा के.उ.ति.शि.सं. सारनाथ में अनुसंधान सहायक के रूप में शुरू की । आगे चलकर प्राचीन काल में भारतीय तथा तिब्बती पंडितों ने मिल-जुलकर किये तिब्बती अनुवादों के आधार पर संस्कृत में लुप्त बौद्ध ग्रंथों का तिब्बती अनुवादों से पुनरुद्धार करने के लिए संस्थान में स्तथापित अनुसंधान विभाग के वे प्रमुख नियुक्त किए गये । इस अद्वितीय अनुसंधान कार्य से उनकी तिब्बती तथा संस्कृत भाषाओं की विशिष्ट विद्वत्ता का तथा उनके दुर्लभ अनुवाद-कौशल्य का पता चलता है। इस क्षेत्र में उपलब्धियों के फल-स्वरूप आपकी पदोन्नति बौद्ध दर्शन के प्राध्यापक पद पर की गई। संस्कृत तथा तिब्बती बौद्ध ग्रंथों के हिंदी अनुवाद कार्य में आप अभी भी सक्रिय है ।



नागार्जुन के दर्शन में अपनी विशेष रुचि के कारण, प्रो. समतेन ने ‘रत्नावली’ की भाष्य सहित निर्णायक आलोचनात्मक आवृत्ति प्रकाशित की है – यह उनके स्नातकोत्तर अनुसंधान का फलित था । कई महत्त्वपूर्ण प्रकाशनों का श्रेय उन्हें जाता है – जैसे कि ‘अभिधम्मत्थसंगहो’ की समालोचनात्मक आवृत्ति, ’पिंडीक्रम’ तथा नागार्जुन कृत ‘पंचक्रम’ के संस्कृत तथा तिब्बती पाठों की समालोचनात्मक आवृत्ति और अभी-अभी, नागार्जुन की मूलमध्यमक कारिका पर तिब्बती आचार्य दार्शनिक चोंखा-पा के भाष्य का टिप्पणियों सहित अंग्रेजी अनुवाद ‘द ओशन ऑफ रीज़निंग्’, ऑक्स्फोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित इस ग्रंथ को पूरे विश्व में सराहा गया है ।

भारत में बौद्ध अध्ययन को गति एवं दिशा प्रदान करने में आप सफलीभूत हुए है । कई सारे विश्वविद्यालयों के बौद्ध विद्या के पाठयक्रम तैयार करने के काम में उनकी विद्वत्ता तथा अंतर्दृष्टि का लाभ पहुँचा है । विविध क्षेत्रों के कौशल्य के विकास के साथ-साथ, छात्रों में मूल्यों के विकास के माध्यम से परिवर्तन लाने में शिक्षा व्यवस्था का योगदान जरूरी है, इस दृष्टिकोण के वे समर्थक है । यू एस ए, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, रुस तथा भारत में शैक्षिक समुदायों को संबोधित करते रहते है । विविध राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा सत्रों में, कार्यशालाओं में तथा सम्मेलनों में वे कार्यरत रहते आये है । हैंप्शायर, ऐमहर्स्ट तथा यूएसए के स्मिथ कॉलेज और ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया विश्वविद्यालय में उन्होंने आमंत्रित प्राध्यापक के रुप में अपनी सेवाएं प्रदान की हैं। उनकी विदग्धता तथा प्रज्ञा के कारण प्रो. समतेन की भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों तथा अनेक अन्य संगठनों की विशेषज्ञ-समितियों के अध्यक्ष या सदस्य नामित हुए हैं। प्रो. समतेन कनाडा, थाईलैण्ड, फ्रान्स, ऑस्ट्रिया के कई संस्थानों की समितियों के सदस्य रहे है । हार्वर्ड की अन्तर्राष्ट्रीय तिब्बती अध्ययन संघ के संपादक-मंडल को सदस्य के रूप में भी आपने अपना योगदान दिया है। वे विविध समितियों के सदस्य हैं – जैसे कि भारतीय विश्वविद्यालय संघ की संचालक समिति, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विविध विशेषज्ञ समितियों के अध्यक्ष / सदस्य । 2008 में उन्हें शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए भारत सरकार के राष्ट्रपति द्वारा ‘पद्मश्री’ उपाधि प्रदान की गयी । वर्तमान समय में आप कें. उ. ति. शि. सं. सारनाथ, वाराणसी के कुलपति है ।
 


कुलपति - संक्षिप्त व्यक्ति परिचय

प्रो. गेशे ङवङ् समतेन (जन्म1956) सम्प्रति के. उ. ति. शि. सं. सारनाथ, वाराणसी के कुलपति हैं तथा इस पद को ग्रहण करने के पहले वे इसी संस्थान में भारतीय बौद्ध दर्शन के प्राध्यापक रहे है । उनकी शिक्षा आधुनिक तथा बौद्ध और तिब्बती भिक्षु-परम्परा दोनों प्रकार से हुई । आपके विशेष शैक्षणिक योगदान को रूप में ‘रत्नावली’ का समालोचनात्मक संपादन (‘अभिधम्मत्थसंगहो’ भाष्य के साथ), नागार्जुन के ‘पिंडीकृत’ तथा ‘पंचक्रम’, ‘मंजुश्री’ (तिब्बती-बौद्ध पट्ट-चित्रांकन) पर सोदाहरण प्रबन्ध तथा ‘द ओशन ऑफ रीज़निंग’ का सह-लेखकत्व (यह तिब्बती आचार्य-दार्शनिक च़ोंखा-पा की नागार्जुन कृत ‘मूलमध्यमककारिका’ के तिब्बती भाष्य का टिप्पणियों सहित अँग्रेजी अनुवाद है ।) और भारत तथा भारत के बाहर पांड़ित्यपूर्ण संकलनों में आपके अनेक निबंध प्रकाशित हुए है । यूएसए तथा ऑस्ट्रेलिया के विविध विश्वविद्यालयों में आप आमंत्रित प्राध्यापक रहे है । भारत में बौद्ध विद्याओं का प्रसार करने में भी आपका विशेष योगदान रहा है । बौद्ध दर्शन तथा अनुसंधान के पाठ्य-क्रमों का निर्धारण करने के मामले में भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने आपका मार्गदर्शन तथा परामर्श प्राप्त किया है । वे अनेक शैक्षिक समितियों, विश्वविद्यालयों तथा भारत सरकार के मंत्रालयों की विशेषज्ञ समितियों के सदस्य है । 2008 में, उनके शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में किए विशिष्ट योगदान की मान्यता के तौर पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें ‘पद्मश्री’ पुरिस्कार से अलंकृत किया गया है ।